बर्फ, बादल और भावनाएँ: सिक्किम यात्रा की कहानी
सिक्किम की यात्रा के अनुभव को दर्शाती यह कहानी प्रकृति की सुंदरता, जीवंत संस्कृति और वहां के लोगों की सादगी का अनूठा संगम है। पेल्लिंग से गंगटोक और लाचुंग तक का सफर, बर्फीले पहाड़, झरने और मठों की शांति के साथ-साथ सिक्किमवासियों का सेवा भाव और जीवन जीने का सलीका इस लेख में पिरोया गया है।
काम के सिलसिले में भारत के उत्तर पूर्व राज्यों में इसके पहले भी जाने का मौका मिला था। इसके अलावा अख़बार और किताबों से भी कुछ जानकारी मिली थी| लेकिन अबाउट लव एंड फॉलिंग इन लव में जो फर्क होता है वही फर्क जब हम ज्यादा समय के लिए आये तो सिक्किम के बारे में महसूस होने लगा| उत्तर पूर्व राज्यों के बारे में एक बचपन में सुनी कहानी से प्रेरित अधोलिखित कहानी महसूस हुई|
एक प्रतिभासंपन्न गरीब दंपत्ति जिसकी सात सुंदर एवं प्रतिभावान बेटियां थी| प्रत्येक बेटी की सुंदरता और प्रतिभा बिलकुल अलग थी। यह सब देखकर उस गॉंव के लोग यह तय करते हैं कि इन लड़कियों की मदत कि जाये, ताकि उनकी प्रतिभा से उस परिवार का उथ्थान हो सके| जब मैं उत्तर पूर्व के सात राज्यों के बारे में सोचता हूँ तो ऐसा लगता है कि यह कहानी इन सात राज्यों कि कहानी है| अगर राज्य सरकार, केंद्र सरकार तथा टुरिस्ट सब मिलकर कोशिश करें तो इन सात बहनों को और अधिक उन्नत किया जा सकता है, नैसर्गिक सम्पन्नता और सुंदरता को संभलकर और संजोंकर| इसी एक मानसिकता के साथ हमने पहिली सिस्टर सिक्किम का दौरा शुरू किया|
मौसम की अनिश्चितता इन राज्यों में जीवन किस हद तक चुनौतीपूर्ण बना देती है इसकी पहली झलक हमें उस वक़्त मिली, जब टूर शरू करने से तीन दिन पहले टूर एजंटचा का फोन आया कि राष्ट्रीय महामार्ग १० तेज बारिश की वजह से खराब हो गया और मरम्मत के लिए कुछ समय के लिये बंद कर दिया गया है| इसलिए बागडोरा पेल्लिंग सफर जो तीन- साढ़े तीन घंटे का था वह आठ घंटे का हो गया। जब कभी सफर बढ़ जाता है तो आम तौर पर यह माना जाता है कि सफर में ज्यादा दिक्कतें होंगी। लेकिन जब आप प्रकृति की गोद में लंबा सफर कर रहे हो तो समय की परिभाषा बदल जाती है। आप रास्ते में इतना खो जाते हैं कि आपको पता ही नहीं लगता कि समय कैसे बीत गया। ठीक ऐसा ही अनुभव हमें भी आया। रास्ते की खूबसूरती निहारते- निहारते देर रात हम कब पेल्लिंग पहुंचे पता ही नहीं लगा।
ज्यादातर वक़्त होटल में जब आप पहुँचते है तो रिसेप्शन पर कृत्रिम मुस्कान से स्वागत होता है। लेकिन पेल्लिंग में होटल में पहुंचने के बाद हमारा स्वागत बिल्कुल ही अलग ढंग का था। होटल स्टाफ ठीक वैसे ही खड़ा था जैसे हम हमारे बहुत दूर से काफी दिनों बाद आये परिवार के सदस्यों के लिए पोर्च में खड़े होतें है । खाने की टेबल पर भी हमारा अनुभव ठीक वैसा ही था।
पेल्लिंग में हमारा पड़ाव दो दिनों का था जहाँ हम रिम्बी ऑरेंज गार्डन, युकसोम, चेंजी झरना, ताशीडिंग मठ , स्काई वाक, बुद्ध टेम्पल , सिडकेओंग बर्ड पार्क आदि देखने वाले थे। शुरुवात रिम्बी ऑरेंज गार्डन से की गयी। इतनी ऊंचाई पर संतरे का बगीचा देखकर काफी आश्चर्य हुआ। संतरे के पेड़ों के साथ-साथ इलायची और रंगबिरंगी फूलों के पौधे, आसपास के पहाड़ों के बीच बहती नदी, वातावरण को और भी मनमोहक बना रहे थे। जहाँ आप नदी किनारे चट्टानों पर बैठ एकांत में रोडोडेंड्रोन वाइन के साथ प्रकृति का संगीत सुन सकते है। यह वाइन रोडोडेंड्रोन पौधे के फूलों से बनाई जाती है, और इसमें औषधीय गुण हैं।
सिक्किम या किसी भी पहाड़ी इलाके से बहती नदियों की यह खासियत होती है कि उनका निनाद दूर-दूर तक न सिर्फ सुनाई देता है बल्कि दिल की गहराइयों में उतरने लगता है। फिर चाहे वो रास्तों से लगकर बहती नदी हो या बर्फीली पहाड़ियों से गिरते झरनो से बनकर बनीं नदी हो। पहाड़ी नदियों की एक खासियत और है, उसकी चंचलता आपके मन में उतरने लगती है और आप धीरे-धीरे उम्र के अहसास से परे चले जाते हैं और प्रकृति का आनंद दिल से ले पाते हैं।
रिम्बी ऑरेंज गार्डन के बाद हम युकसोम पहुंचे। युकसोम वर्तमान और भूतकाल के बीच की कड़ी है। यह सिक्किम की पहली राजधानी थी। जिसकी स्थापना सन् 1642 में फुंटसोग नामग्याल ने की थी, जो सिक्किम के पहले चोग्याल (अस्थायी और धार्मिक राजा) थे। सिक्किम के पहले राजा के राज्याभिषेक स्थल को "नोरबुगांग का सिंहासन" के रूप में जाना जाता है।
चेंजी झरना (Changey Waterfall) लगभग 300 फीट की ऊंचाई से गिरती हुई घनी हरियाली से निकलती हुई एक सफेद रेखा की तरह दिखता है। हरी-भरी वनस्पतियों और ऊंची पहाड़ियों की प्राकृतिक पृष्ठभूमि के साथ, झरना एक आदर्श पर्यटक आकर्षण है। झरने के पास, डेंटम बाज़ार भी स्थित है जहाँ आगंतुक कुछ खरीदारी कर सकते हैं ।इस वाटर फॉल की खासियत यह है कि यह आपको रोड पर से दिखाई नहीं देता। जब आप ५०-६० सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर जाते है तो यह बेहद खूबसूरत वाटर फॉल अचानक दिखाई पड़ता है। इसके बिल्कुल करीब जाकर पत्थरों पर बैठकर न सिर्फ यह वाटर फॉल देख सकते हैं बल्कि महसूस भी कर सकते हैं। प्रकृति से तारतम्य साधने की एक अनूठी अनुभूति देता है यह वाटर फॉल।
ताशीडिंग मठ रथोंग चू और रंगीत नदी के बीच उभरी पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। ताशीडिंग मठ पश्चिमी सिक्किम, तिब्बती बौद्ध धर्म के निंगमा संप्रदाय का एक बौद्ध मठ है, जो सबसे पवित्र मठ माना जाता है। शायद इसी वजह से इसे "सिक्किम/डेन्ज़ोंग का हृदय" के रूप में वर्णित किया जाता है। इस ऊँची पहाड़ी पर स्थित मोनेस्ट्री का शांत वातावरण साथ में बहती नदी की आवाज, पंछियों की मधुर स्वर, नीला आकाश और हलकी सहलाती ठंडी हवा आपको अन्तर्मुख कर एक अलग ही आत्मिक शांति का अनुभव कराती है।
पेल्लिंग का सिडकेओंग बर्ड पार्क पक्षी प्रेमियों के लिए एक स्वर्ग है, हिमालय की सुन्दर पृष्ठभूमि इसे और भी खूबसूरत बना देती है। पार्क की प्राकृतिक सुंदरता और अच्छी तरह से बनाए गए रास्ते इसे प्रकृति की सैर के लिए एकदम सही बनाते हैं। जो रंग शायद हमने किताबो में भी न देखे हो उस रंग के पक्षी देखकर आपके अंदर का फोटोग्राफर जागृत हुए बगैर नहीं रह सकता। पशु प्रेम, विविध वन्य जीवन और संरक्षण के प्रति पार्क की प्रतिबद्धता सराहनीय है। रोमांच और शांत वातावरण का अद्भुत संगम यहाँ हमें देखने मिलता है।
पहाड़ की ऊंचाई पर बने स्काई वाक पर ठण्डी हवा के झोंकों के साथ पारदर्शक कांच की सतह पर चलना अपने आप में एक अलग ही अनुभव है। यहाँ से आप पैराग्लाइडिंग करते पर्यटक भी देख सकते हैं। पैरा ग्लाइडिंग की बुकिंग एक दिन पहले करनी होती है। यह हमें वहां जाने के बाद पता लगा, इसलिए हम इसका मज़ा नहीं ले सके। स्काई वाक से लगकर ही एक सुंदर बौद्ध मठ है, जहाँ से आप पेल्लिंग शहर का विहंगम दृश्य देख सकते हैं।
दो दिन पेल्लिंग में गुज़ारने के बाद हम गंगटोक के लिए निकले। पेल्लिंग से गंगटोक करीब सात घंटे का रास्ता है। रास्ते का हमारा पहला पड़ाव था सेवन सिस्टर वाटर फॉल। बर्फ के पिघले या बारिश की वजह से यहाँ पहाड़ी से सात झरने गिरते हम देख सकते है, इसलिए इसका नाम सेवन सिस्टर्स वॉटरफॉल पड़ा है। सेवन सिस्टर्स वॉटरफॉल के अलग-अलग झरनो का मिलकर नदी बनते देखना या झरनो और सूर्य की किरणों से मिलकर ज़मीं पर बनते इंद्रधनुष को देखना अपने आप में एक अलग ही अनुभव है। ठीक वैसा ही, जैसे हमारे अलग-अलग राज्यों की संस्कृति का, सभ्यता का मिलकर भारतवर्ष बनाना।
इसी रास्ते में आगे है चार धाम की प्रतिकृति है। पहाड़ी से घिरे, प्रकृति की गोद में पथ्थरों को तराश कर बने मंदिर देखने लायक है। इसी रास्ते, करीब दो घंटे की दूरी पर बहुत ही खूबसूरत बुद्ध गार्डन है। जिसमें भगवान बुद्ध की अलग-अलग मुद्राओं की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं हैं। काफी बड़ा परिसर है यह। बैटरी से चलने वाली कार्ट से आप पूरा परिसर कम समय में देख सकते है। पेल्लिंग से गंगटोक के रास्ते को स्पिरिचुअल टूरिज्म की तरह विकसित करने में सरकार की भागीदारी प्रशंसनीय है।
गंगटोक से लाचुंग का रास्ता उत्तर सिक्किम की सुंदरता की अलग-अलग पहलुओं की झांकी सा लगा। इसके अलावा अगर प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाए तो क्या हो सकता हैं यह भी इसी रास्ते हमें देखने मिला। पिछले साल लाचेन के ग्लेशियर टूटने से हुई तबाही की तीव्रता का अंदाजा पूर्णतः नष्ट हुए बांध के देख कर महसूस हुआ। इस घटना के छह महीने बाद, आज भी लाचेन जाने वाले सारे रास्ते बंद हैं। जरूरत का सामान एयरलिफ्ट किया जाता है।
लाचुंग में गुजारे ३६ घंटे बड़े ही अविस्मरणीय रहे। होटल के कमरे से ही हम वाटर फॉल, बहती नदी और सुबह के सूर्य की किरणों से स्वर्णिम बर्फाच्छादित पहाड़ियाँ देख सकते थे । इससे बेहतर सुबह और क्या हो सकती है?
लाचुंग से जीरो पॉइंट का रास्ता बेहद खूबसूरत है। ऐसा लगता है मानो बर्फ़ के बीच में काली जर्द कालीन। दोनों ओर बर्फ़ की क्यारियां, स्वागत कर रहीं है ऐसा महसूस होता है, हर की अपनी अलग अदा। बर्फ़ की हर क्यारी कुछ ना कुछ कह रही। मानो हम पर अपने अनोखे अंदाज़ में प्यार न्यौछावर कर रही हो।
उत्तर सिक्किम के चंचल मौसम का मिजाज़ और प्रकृति के विविध पहलू हमें बड़े करीब से देखने मिले। सुबह प्यारी धूप, उसके बाद बादल की चादर ओढ़ती हरे वृक्षों से आच्छादित पहाड़ी , मखमली बर्फ से सजी पहाड़ी ,स्नो फॉल ,वाटर फॉल, तेज बारिश , बहती नदी , ठहरी झील, फूलों की गालिचें नुमा क्यारियां । प्रकृति के इतने रूप एक दिन में देखना यहाँ आने से पहले कल्पनातीत था।
गंगटोक, सिक्किम की राजधानी, कमर्शियल हब , हर रोड और गलियों में सभी प्रकार के होटेल्स, सिक्किम के बाकि सभी शहरों से बिलकुल अलग। यहाँ के प्रमुख आकर्षण एम जी रोड, चांगु लेक, न्यू बाबा मंदिर और नाथुला पास हैं।
सभी हिल स्टेशन की तरह यहाँ का ऍम जी रोड टूरिस्ट के लिए बना मार्केट है। फर्क इतना है कि यह बहुत ही साफ-सुथरा, सुन्दर और किफायती हैं। यहाँ आप तरह-तरह के गिफ्ट आइटम अपने लिए और अपनों के लिए खरीद सकते हैं। गंगटोक में आये पर्यटक अगर यहाँ एक श्याम न बिताये तो उनकी सिक्किम ट्रिप अधूरी मानी जाती हैं।
चांगु लेक 12,400 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और गंगटोक से लगभग 38 किलोमीटर दूर है। यह लेक सूर्य प्रकाश में नीले आकाश के साथ नीली दिखती है और अगर बादल छा जाए तो ब्लैक एंड। एक ही पिक्चर में रंगीन और श्वेत शामल गाना देखने पर जो अनुभूति होती हैं वैसा ही कुछ आप महसूस करते हैं इस लेक के ये दो रूप देखकर। इसके उपचार गुणों की वजह से इस झील को सिक्किम के लोग झाकरी मानते हैं।
नाथुला पास, समुद्र तल से 14,450 फीट (4,403 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ से आप चीन की बॉर्डर देख सकते हैं। यहाँ पर चारों तरफ बिखरी महीन बर्फ आपको अपनी उम्र भूलकर बचपन में जाने को मजबूर करती हैं।
बाबा मंदिर, बहादुर सैनिक बाबा हरभजन सिंह, जिन्होंने भारत-चीन सीमा पर अटूट सेवा की उनके सम्मान में भारतीय सेना द्वारा बनाया गया है, और सेना द्वारा ही संचालित है।
पूरे भारत में स्वच्छ भारत का प्रचार और अमल हो रहा हैं। लेकिन सिक्किम एक ऐसा राज्य है जो एक पायदान आगे निकल गया। यहाँ के लोग न सिर्फ स्वच्छ भारत पर यकीं रखते हैं, बल्कि स्वच्छ और सुन्दर भारत को ज्यादा बेहतर ढंग से अमल कर रहें हैं। फिर चाहे वह चौक हो , फुटपाथ हो, बाउंड्री वॉल , घरों की गैलरी हो सब जगहों पर फूलों के पौधे लगे हैं, ज़मी पर या गमलो में। फूलों की और अलग-अलग क्रोटन्स की ताज़गी देखकर ऐसा लगता है मानो ये आपसे कहना चाहते हैं कि आइए सिक्किम की, सुंदर सिक्किम की, ये एक और नई पहचान आप करीब से देखिए। प्रकृति ने तो सिक्किम को बहुत कुछ दिया है। लेकिन यहाँ के लोगों का भी सुंदर बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान है।
सफाई के मामले में भी सभी जगहों पर एक जैसी प्रतिबद्धता दिखी। फिर चाहे वह बाजार हो, रिहायशी परिसर हो या पहाड़ियों से गुजरते रास्ते। पहाड़ियों के रास्ते से गुजरते वक्त बड़े होटेल्स तो होते नहीं हैं, छोटे- छोटे खोमचे होते हैं जहाँ पर मैगी या मोमोज इस टाइप की कुछ चीजें मिलती हैं, लेकिन वहाँ भी बेहद साफ सुथरे टॉयलेट थे। कुल मिलाकर यहाँ की साफ-सफाई , सुंदरता और रखरखाव में आप यहाँ की जनता का आप करैक्टर महसूस कर सकते है।
सिक्किम में कुदरत की सुंदरता और इंसान के दिल की सुंदरता दोनों यहाँ इकट्ठे देखने को मिलते हैं। सिक्किम की जनता से जब भी मिले चाहे भरी ट्रैफिक में, या होटल में, या बाजार में, वे आपस में और पर्यटकों के साथ मुस्कान एक्स्चेंज करते हैं। समाधान का एक अद्भुत जज्बा उनके हर एक्सप्रेशन में महसूस हुआ। कहीं रजनीश ने कहा है कि समाधान की स्टडी स्टेट समाधि होती है। मुझे तो ऐसा लग रहा था कि सिक्किम का हर व्यक्ति समाधि अवस्था में ही लोगों के साथ पेश आता है। चाहे वो रेस्टोरेंट का स्टाफ हो, कार के ड्राइवर हो या ट्रैफिक पुलिस। इसके अलावा मुस्कान और सेवा भाव के अलावा तीसरा भाव नज़र नहीं आया। इतना समाधान यहाँ देखने को मिला और उसके फायदे भी।
ऐसा कहा जाता है कि जब आप प्रकृति से एक रूप को करते हैं। तब आपका व्यक्तित्व ज्यादा पारदर्शक और आश्वासक हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आपकी भाषा और शब्द अधिक आश्वासक लगने लगते हैं जब वे हृदय! और जिव्हा के संबंधों से ध्वनित होते हैं। इसकी सत्यता का एहसास आपको सिक्किम वासियों से मिलकर निश्चित रूप से होता है।
प्रकृति की छठा हम जैसे टूरिस्ट को बहुत सुंदर लगती है, लेकिन यहाँ पर जीने की जो जद्दोजहद है वह हम करीब से नहीं देख पाते। वह अगर महसूस करना हो तो इनके साथ ज्यादा बेहतर एम्पैथाईज़ करना होगा। यहाँ की इकोनॉमी को समृद्ध करने के लिए यहाँ की चीजों को खरीदना होगा। यहाँ का फूड खाना होगा।
हमारे ड्राइवर पासंग जी ने हमें यहाँ के लगभग हर फ़ूड का सहीं जगह और सहीं समय पर जायका लेने का मौका भी दिया। पूरे प्रवास के दौरान ऐसी जगह पर कार रोकी जहाँ खाने की अपनी एक लज्जत थी और प्रकृति के नज़ारे भी थे। खाने की लज्जत और प्रकृति के नजारे अगर दोनों एक जगह मिल जाए। तो क्या सुकून मिलता है, मानों जन्नत मिल गई।
सिक्किम की संस्कृति और खानपान पर नेपाल और तिब्बत का काफी प्रभाव दिखा। यहां के लोग नेपाली गाने और पिक्चर बड़े रस लेकर सुनते/देखते हैं। इसकी वजह शायद सिक्किम की भौगोलिक दृष्टि से इनके करीब होना हो सकता है या नेपाली गानों का सुरीलापन। जो भी हो, भारत , नेपाल और तिब्बत का सांस्कृतिक मिलाप दिल को छूए बगैर नहीं रहता। जहाँ तक खाने का सवाल है, शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का खाना उपलब्ध है। चावल यहाँ के खाने का मुख्य अंग है, इसके साथ दाल, साग या चिकन/मटन। मोमोज, थुपका, ठेंठुक, सेल रोटी बाम्बू शूट की सब्जी ये कुछ ऐसे आइटम है जो खाये बगैर आपकी सिक्किम ट्रिप अधूरी है। यहाँ के खाने की सबसे बड़ी खासियत, खाने में सिर्फ ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल।
हमारे देश में स्त्री पुरुष की समानता होनी चाहिए ऐसा सभी कहते है, लेकिन इसका समाज स्वीकृत अमल हमें सिक्किम में देखने को मिला । फिर चाहे वह विवाह कि बात हो या काम की। ड्राइवर से जब विवाह संस्था के बारे में पूछा तो पता लगा कि यहाँ ज्यादातर विवाह, प्रेम विवाह ही होते है। स्त्री पुरुष की समानता का एक और द्योतक जो नजर आया वह यह था कि यहाँ की स्त्रियां भी पुरुषों से कंधे से कन्धा मिलाकर काम करती नजर आयी। फिर चाहे वह रोड या मकान बनाने का काम हो, गाड़ी चलने का, या दुकान चलाने का। परिवार की जिम्मेवारी दोनों मिलकर बड़ी ख़ुशी से निभाते नजर आये ।
सिक्किम आकर आप प्रकृति से है पल-पल एक रूप होते जाते है और फिर ऐसा लगता है जैसे आपके अंदर के द्वार अपने आप खुल गए हैं
गीतों के लिए;
ठंडी भीनी हवाओं के लिए;
सौंदर्य के लिए;
संगीत के लिए;
सुगंध के लिए;
और आनंदमयी जीवन के लिए;
ज्यादातर वक़्त आठ दस दिन के पर्यटन के बाद वापसी का जर्नी बड़ा उबाऊ होता हैं। लेकिन गंगटोक बागडोगरा राष्ट्रीय महामार्ग मरम्मत पूरी न होने की वजह से बंद ही था इसलिए वापसी में दार्जिलिंग के चाय के बागानों से होकर गुजरे , कमाल के नज़ारे थे जो मानो फिर आने का निमंत्रण दे रहें हो। इतने दूर सिक्किम आना, सफल हो गया।