तंत्र और तत्व
आज सबसे ज्यादा जिस विषय की चर्चा हो रही है, वह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। इसकी चर्चा अलग-अलग स्तरों पर हर घर में देखी जा सकती है। सब के मन में आर्टिफिशल इंटिलिजन्स के बारे में उत्सुकता , भय और आगे क्या होगा इसके बारे में दुविधा भी हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है और हमें उसका इस्तेमाल कैसे करना है? इस बारे में कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालने का इस लेख के माध्यम से एक प्रयत्न हैं।
आज सबसे ज्यादा जिस विषय की चर्चा हो रही है, वह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। इसकी चर्चा अलग-अलग स्तर पर हर घर में देखी जा सकती हैं। सब के मन में आर्टिफिशल इंटिलिजन्स के बारे में उत्सुकता , भय और आगे क्या होगा इसके बारे में दुविधा भी हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है और हमें उसका इस्तेमाल कैसे करना है? इस बारे में कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालने का इस लेख के माध्यम से एक प्रयत्न हैं।
अगर हम मानव सभ्यता (Human Civilization) का इतिहास यूवान नुहा हरारी की नजरों से देखें तो उसे मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक है Homo Sapiens का दौर और दूसरा है Homo Dues।Homo Sapiens मतलब हमारे चिम्पांजी के बाद की पीढ़ी, जिसको हमने इंसान कहा है। पिछले करीब 70,000 साल से ले कर 12,000 सालों तक ये Homo sapiens ही हमारे पूर्वज हुआ करते थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत जो थी, कम्युनिकेशन एंड कोलैबोरेशन। जिसकी वजह से इंसान ने बाकी सभी प्रजातियों से ज्यादा प्रगति की है, कम शक्तिशाली होने के बावजूद भी। ऐसा कहा जाता है कि समूह 150 से ज़्यादा किसी भी समूह कि संख्या अगर १५० से ज्यादा हो जाये और उचित कम्युनिकेशन एंड कोलैबोरेशन न हो, तो समूह बिखर जाता हैं। और धीरे-धीरे वह प्रजाति ख़त्म हो जाती है। नींडर्थर और अन्य कई प्रजातियों के साथ ऐसा हुआ है। लेकिन Homo sapiens ने उस समय कम्युनिकेशन एंड कोलैबोरेशन, सपने देखना या आगे के बारे में सोचना ये सब शुरू किया। इसी वजह से इंसान अन्य कई प्रजातियों की तुलना में कम शक्तिशाली होते हुए भी धरती पर राज कर रहे हैं।
पिछले 12,000 सालों से अभी 10-15 साल पहले तक का दौर होमो ड्यूस का है। इनकी खासियत ये थी कि इन्होंने कम्युनिकेशन एंड कोलैबोरेशन को बेहतर किया, बल्कि tools बनाना सीखा। और नित नए टूल्स बनाकर मानव जीवन बेहतर बनाया। इसके परिणाम स्वरूप इंसान का शारीरिक श्रम कम-कम होता गया और बौद्धिक श्रम , चिंतन-मनन बढ़ता गया। इंसान विकास की नित नयी ऊँचाइयां हासिल करता जा रहा है। लेकिन पिछले 10-15 सालों से अगर हम देखें तो इसमें एक नई चीज़ जुड़ गई है, वह Digital Species या डिजिटल कंपेनियन।
अगर हम आज देखें तो ये साफ दिखता है कि हम हमारा ज्यादा समय मोबाइल, जो डिजिटल कंपनियन का ही एक रूप है, के साथ बिता रहे है न कि अपने परिवार या मित्रों के साथ। इसके मायने यह है, कि मोबाइल जो एक प्रकार कि डिजिटल स्पीशीज, हमारा डिजिटल कम्पैनियन बनता जा रहा है। तो ऐसे समय में इंसानी जज्बा कैसे बनाए रखें, उसकी क्या संभावना है और artificial intelligence हमारे जीवन को किस ढंग से बदल सकता है, इसके बारे में विचार करना आवश्यक हो जाता है।
अगर हमें human की replica बनानी होती है तो लगभग 9 महीने का समय लगता है। जबकि अगर human की digital replica बनानी हो तो 9 seconds में बन जाती है। तो हमारे digital companion बहुत जल्दी बन जाने की वजह से हम उससे ज़्यादा से ज़्यादा जुड़ते जा रहे हैं।
जो लोग थोड़ा भी डिजिटल टेक्नोलॉजी से जुड़े हो, उनको शायद पता भी होगा, लेकिन जो लोग डिजिटल टेक्नोलॉजी से सिर्फ फेसबुक , व्हाट्सअप , या अन्य सोशल मीडिया से जुड़ें है। उन्हें शायद यह पता भी नहीं है कि ये प्लेटफार्म आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का कितना ज्यादा इस्तेमाल कर रहें है। अभी जो statistics आए हैं हमें वें हां बताते हैं कि
फेसबुक आपके 10 लाइक्स का विश्लेषण कर आपको आपके सहकर्मी से बेहतर जान लेता है
फेसबुक आपके 70 लाइक्स का विश्लेषण कर आपको आपके मित्रों से बेहतर जान लेता है
फेसबुक आपके 150 लाइक्स का विश्लेषण कर आपको आपके परिजनों से बेहतर जान लेता है
फेसबुक आपके 300 लाइक्स का विश्लेषण कर आपको आपके पति या पत्नी से बेहतर जान लेता है
तो यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पावर है। पहले जमाने में एक इंसान को पहचानने में लंबा समय लगता था, लेकिन अभी आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से, digital platform की वजह से, इंसान को जानना काफी आसान हो गया है। ऐसा कहा जाता है कि हमारी 270 प्रकार की भावनाएं हैं जो 7000 प्रकार के अलग-अलग एक्सप्रेशन के अलग-अलग combination से व्यक्त होती है। इस वजह से इतने सारे एक्सप्रेशन का विश्लेषण कर भावनाओं को समझना साधारण मानव के लिए बहुत ही कठिन हो जाता है और हम इंसान को जानने में कई बार गलती कर बैठते हैं। इसके ठीक विपरीत आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से हम इंसान के बोलने के तरीके, आवाज के उतार चढ़ाव, चेहरे के हावभाव, देह बोली, इत्यादि का सहज ही विश्लेषण कर इंसान की भावनाएं या मनोदशा बड़ी आसानी से जान सकते हैं। लेकिन आर्टिफिशल इंटेलिजेंस तंत्र की एक मर्यादा है, ये क्या है ये तो बता सकते हैं, लेकिन इंसान की भावनाएं या मनोदशा ऐसी क्यों है ये आर्टिफिशल इंटेलिजेंस तंत्र नहीं बता सकता।
इसका मतलब यह हुआ कि कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस तंत्र एक संभावना तो बताता है लेकिन वह एक संवेदना रहित संभावना है। अब हम इस मोड पर आ गए हैं, जब Homo Dues और Digital Species दोनों मिल रहे हैं, जहां पर हमें अब संभावना और संवेदना इन दोनों का उचित संगम करने की आवश्यकता है।
आज WhatsApp से और अलग-अलग प्लैटफॉर्म की मदद से आप बहुत ज़्यादा संवाद तो कर रहे हैं लेकिन यह संवाद जो है संवेदना रहित होता जा रहा है। इसके अलावा किसी करीबी या जानकर व्यक्ति से पूछने के बजाय हम कोई भी चीज का जवाब आप पहले या तो Google पर खोजते हैं या ChatGPT से। लोग इन टूल्स का प्रचार ऐसे कर रहें है कि यह इंसान को एमपॉवर करने में मदद कर रहें है। यह काफी हद तक सही भी है। लेकिन एमपॉवर करना बात अलग है और आत्मबल बिल्कुल अलग है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस तंत्र से आत्मबल नहीं बढ़ाया जा सकता। आत्मबल अगर बढ़ाना हो तो उसके लिए हमें आध्यात्मिकता के तरफ आना होगा, इमोशनल क्वोशन्ट, एक्शन क्वोशन्ट, पॉजिटिव क्वोशन्ट बढ़ाना होगा।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस हमारा विश्वस्त तो हो सकता है लेकिन भाव- विश्वस्त, जिस पर हम भावना के साथ विश्वास डाल सकें यह कभी नहीं हो सकता। इसके मायने यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हृदय परिवर्तन नहीं कर सकता , विचार भले ही दूषित कर दे। हृदय परिवर्तन के लिए तत्व की आवश्यकता होती है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस एक तंत्र है। तंत्र और तत्व इन दोनों का सही सम्मिलन किए बगैर आने वाले समय में परिवर्तन करना मुश्किल हो जाएगा। अब इस तंत्र का इस्तेमाल तत्व को समझने के लिए कैसे कर सकते है यह हम कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते है।
स्वामी विवेकानन्द जी के बारे में हम सभी ने सुना है। बहुत से लोग ये भी मानते है कि आज के परिपेक्ष में उनके द्वारा सुझाएँ गए तत्व ज्यादा प्रासंगिक होते जा रहें है। स्वामी विवेकानन्द जी के विचार हम उनके द्वारा लिखी अनेक किताबों को पढ़कर जान सकते है। लेकिन आज हम अगर किसी सवाल का जवाब स्वामी विवेकानन्द जी की लिखी किताबों में खोजने जाए तो बहुत समय लग सकता है और यह भी हो सकता ही कि समय के अभाव में हम वह खोजने कि कोशिश बीच में ही छोड़ दें। ऐसे में हम स्वामी विवेकानन्द जी के तत्व और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस तंत्र का सम्मिलन कर ज्यादातर लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव कैसे ला सकते यह समझने कि कोशिश करते है।
आज टेक्नोलॉजी कि मदद से हम स्वामी विवेकानन्द जी का लिटरेचर, उनके सारे अनुभव, उनके सारे पत्र, उनके सारे बैठक के कार्यवृत्त और उस समय पूछे गए सवालों के जवाब सारा का सारा एक प्लैटफॉर्म पर ला उसका आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से विश्लेषण कर सकते हैं। तब हम उस प्लैटफॉर्म पर यह पूछ सकते हैं कि मुझे आज यह प्रॉबलम हो रहा है, अगर आज स्वामी विवेकानन्द होते हैं तो वे क्या सलाह देते।
विनोबा भावे जी से जुड़ा हुआ तंत्र और तत्व से जुड़ा एक किस्सा है । विनोबा भावे जी ने भूदान मुहीम चलाई थी। जिसके तहत वे पूरे भारत भर पैदल घूम-घूम कर निवेदन कर रहे थे कि जिनके पास ज्यादा खेतिहर जमीन थी, ज्यादा से ज्यादा जमीं वे भूमिहीनों को दान करें ताकि गरीब खेतिहर मजदूरों को जमीन मिल सके और वे बेहतर जीवन जी सके।
इसी मुहिम के दौरान बहुत से नक्सलवादी विनोबा भावे जी से मिलने आये और उनसे निवेदन किया कि आप हमारे साथ जुड़ जाए, ताकि भूदान मुहिम ज्यादा तेजी से अमल में लायी जा सके। विनोबा भावे जी नक्सलवादियों से कहा कि भूदान मुहिम ह्रदय परिवर्तन से ज्यादा कारगर तरीके से अमल में लायी जा सकती है और उन्होंने अलग-अलग तरीकों से नक्सलवादियों को समझने कि कोशिश की । लेकिन वे इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हो रहे थे। उनका कहना था कि यह काम बन्दूक की नोक पर ज्यादा तेजी से और कारगर तरीके से किया जा सकता है। तब अंत में विनोबा भावे जी ने नक्सलवादियों से सिर्फ एक सवाल पूछा, आपको नक्सलवादी बन्दूक की नोक पर बनाया गया है या ह्रदय परिवर्तन से। तब नक्सलवादी निरुत्तर हो गए।
यही बात है तत्व की, यही बात हृदय परिवर्तन की। वह जो टूल है बन्दूक उसका उपयोग ह्रदय परिवर्तन के लिए नहीं किया जा सकता। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग भी हृदय परिवर्तन के लिए नहीं किया जा सकता। लेकिन विवेकानंद जी , गाँधी जी , विनोबा जी या समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले, इनके विचारों को आज के परिपेक्ष में उठाने वाले सवालों के जवाब ढूँढ़ने और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए के लिए किया जाये, तो यह तंत्र और तत्व का सुंदर संगम मानव के भौतिक और आध्यात्मिक विकास का संतुलन बनाने में काफी मददगार साबित हो सकता है। परन्तु, तंत्र और तत्व यह दोनों मिलेंगे नहीं तो तंत्र के गलत इस्तेमाल की संभावना काफी बढ़ जाएगी और मानव समाज गलत दिशा की जा सकता है।
हम सभी जानते हैं कि कर्म और विचार से मनुष्य निरंतर संस्कारित होता रहता है। या यूं कहें कि कर्म और विचार की परतें ही हमारे संस्कार बन जाती है। अगर हमारे कर्म और विचार समय के अनुरूप बदलते हैं तो मनुष्य फ्लेक्सिबल होता है वरना रिजिडिटी आ जाती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग नित्य ही हमारे कर्म और विचारों को प्रभावित कर रहे हैं। हमारी आसक्तीयो और वासना को पहचान कर उसे उद्वेलित कर विचारों को कुछ हद तक दूषित भी कर रहें हैं। ऐसे समय में यह आवश्यक हो जाता है कि हम तंत्र और तत्व का उचित संगम करें, हमारी टेक्नोलॉजी के साथ की रिलेशनशिप मे पॅसिव्ह युजर से एक्टिव क्रिएटर के की ओर जाएँ। तंत्र और तत्व का उचित उचित संतुलन बनायें, और कोशिश करें कि माइंडफुलनेस और माइंड वांडरिंग के बीच हमारे समय पर हमारा नियंत्रण हो, ना कि आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स से प्रेरित अटेन्शन इकॉनॉमी पर चलने वाले व्यावसायिकों का।