बारिश में शिमला: बादलों, पहाड़ों और सेब के बागों के बीच
यह लेख शिमला की प्राकृतिक सुंदरता, बादलों और पहाड़ों की अठखेलियों, कोटगढ़ के समृद्ध सेब इतिहास और 'देवदार कॉटेज' के आत्मीय अनुभवों का एक भावपूर्ण सफरनामा है।
एक 35 साल पुरानी इच्छा से उपजी कोटगढ़ की यात्रा
एक पुरानी इच्छा, एक नया सफर
कुछ इच्छाएँ समय के साथ समाप्त नहीं होतीं। वे हमारे भीतर कहीं गहराई में चुपचाप जीवित रहती हैं और अवसर मिलते ही फिर से दस्तक देने लगती हैं।
मेरे मन में भी ऐसी ही एक इच्छा पिछले लगभग 35 वर्षों से कहीं सुरक्षित थी। विद्यार्थी जीवन में कुल्लू के बिजली महादेव मंदिर की ट्रेकिंग के दौरान मुझे पहली बार सेब के एक बाग में जाने और पेड़ से ताज़ा सेब तोड़कर खाने का अवसर मिला था। उस अनुभव ने मन में एक छोटी-सी इच्छा जगा दी थी—कभी न कभी सेब के बागों के बीच कुछ दिन बिताने की।
समय बीतता गया, लेकिन वह इच्छा बनी रही।
फिर एक दिन शिमला में रहने वाली मेरी छोटी बहन का फोन आया। उसने बताया कि सेब की फसल तैयार होने लगी है और यही वह समय है जब शिमला के आसपास किसी सेब के बाग में ठहरने का अनुभव लिया जा सकता है।
बस, फिर क्या था! वर्षों पुरानी इच्छा को जैसे पंख मिल गए। मैंने तुरंत निमंत्रण स्वीकार किया और शिमला की यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।
बादलों और पहाड़ों का रिश्ता
ज़्यादातर लोगों की यह धारणा है कि शिमला या तो गर्मियों में जाना चाहिए या बर्फबारी के मौसम में। लेकिन पिछले करीब 19 वर्षों से पुणे में रहते हुए मैं बारिश के मौसम में घूमने का शौकीन हो गया हूं, इसलिए मेरे लिए बरसात में शिमला की यह यात्रा दोगुनी आकर्षक थी। शिमला पहुंचते ही पहाड़ों और बादलों के आपसी रिश्ते को एक बिलकुल नए नज़रिए से देखने का मौका मिला।
कभी बादल सारे पहाड़ों को ढक लेते और लगता मानो पहाड़ों ने सूरज से छिपने के लिए बादल की एक बड़ी चादर ओढ़ ली हो। कभी कुछ पहाड़ियां बादलों से घिरी होतीं और कुछ खुली रहतीं, मानो पहाड़ बादलों के साथ लुका-छिपी खेल रहे हों।
कई बार बादल का कोई छोटा-सा टुकड़ा घाटी में स्वतंत्र रूप से तैरता दिखाई देता। उसे देखकर ऐसा लगता मानो वह बड़े बादल का हाथ छोड़कर अकेले ही दुनिया देखने निकल पड़ा हो। इन्हीं बादलों और पहाड़ों को देखकर शायरा सबा के ये शब्द याद आते हैं —
सूरज की रौशनी को रोक कर
बादल बड़े इतराने लगे हैं
जंगल, पहाड़ सब हो चुके,
घर पे घुसपैठ करने की फिराक में
अब तो अहाते में भी मंडराने लगे हैं
यह आंख-मिचौली पूरी शिमला यात्रा के दौरान लगातार चलती रही — बालकनी से जब भी बाहर झांकते, हर बार बिलकुल नया नज़ारा दिखाई देता।
कोटगढ़: भारत का सेब का कटोरा
शिमला में एक दिन गुज़ारने के बाद हम कोटगढ़ की ओर रवाना हुए। कोटगढ़ समुद्र तल से लगभग 7,000 फीट की ऊंचाई पर बसी एक सुंदर घाटी है। यहां हमारे ठहरने की व्यवस्था देवदार कॉटेज होमस्टे में थी, जिसकी बालकनी से सतलुज नदी और बादलों से आंख-मिचौली करती उप-हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं का मनमोहक दृश्य दिखता था।
कोटगढ़ प्रकृति-प्रेमियों के लिए खास जगह है। यहाँ के विशाल सेब और चेरी के बाग, देवदार और चीड़ के घने जंगल तथा शांत, मनमोहक वातावरण — यह सब, तेईस साल पहले मेरे मित्र समीर दीवान के उपन्यास “अभी तो बर्फ गिरनी बाकी है” में पढ़ा था। लेकिन जब हम इस घाटी में ठहरे, तब जाकर समझ आया कि सेब की फसल के मौसम का आकर्षण असल में क्या होता है और क्यों होता है। पेड़ों पर लदे सेब पूरी घाटी को रंगों और समृद्धि से भर देते हैं। हमें कोटगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता और उसकी प्रसिद्ध सेब-संस्कृति को अपने चरम रूप में देखने का बेहद सुंदर अवसर मिला।
इस जगह का इतिहास भी उतना ही प्रेरणादायी है। वर्ष 1815 में गोरखाओं की ब्रिटिशों से हार के बाद कोटगढ़ ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। इस घाटी की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक सुंदरता से प्रभावित होकर ब्रिटिश अधिकारियों ने यहां मिशनरी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन दिया, जिसका प्रभाव आज भी यहां की संस्कृति में देखने को मिलता है।
वर्ष 1916 में अमेरिका के फिलाडेल्फिया से एक मिशनरी, सैमुअल इवान स्टोक्स, इस स्थान पर आए। शुरुआत में उनका उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार करना था, लेकिन यहां के लोगों की सरलता और घाटी की अनुपम सुंदरता से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहीं स्थायी रूप से बसने का फैसला किया। उन्होंने स्थानीय युवती एग्नेस बेंजामिन से विवाह किया, बाद में हिंदू धर्म अपनाकर अपना नाम सत्यानंद स्टोक्स रख लिया। उनके वंशज आज भी कोटगढ़ में रहते हैं।
सत्यानंद स्टोक्स ने ही इस क्षेत्र में पहला व्यावसायिक सेब का बाग स्थापित किया था, जिसके लिए पौधे अमेरिका की प्रसिद्ध स्टार्क एप्पल नर्सरी से मंगवाए गए थे। एक समर्पित समाजसेवी के रूप में उन्होंने स्थानीय किसानों को भी सेब की खेती के लिए प्रेरित किया। आज, सौ से अधिक वर्षों बाद, ये बाग भरपूर उपज देते हैं और कोटगढ़ घाटी हिमालय के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में गिनी जाती है — इसे ‘भारत का सेब का कटोरा’ (Apple Bowl of India) भी कहा जाता है।
देवदार कॉटेज और अतुल मेहता जी
अब बात होमस्टे की खासियत और उसके मालिक अतुल मेहता जी और उनके परिवार की। पहाड़ों की इस ऊंचाई पर पहुंचना ही अपने आप में एक उपलब्धि है, और यहां तीन मंज़िला होमस्टे खड़ा करना कितना बड़ा संघर्ष रहा होगा, इसका अंदाज़ा तब हुआ जब उन्होंने बताया कि पहले इसे अपने माता-पिता के रिटायरमेंट होम के रूप में बनाना तय हुआ था, और इसे बनाने में करीब 11 साल लगे। बाद में उनके मन में विचार आया कि क्यों न इसे घर और होमस्टे दोनों में बदल दिया जाए। इस तरह ग्राउंड फ्लोर और पहली मंज़िल घर के लिए और ऊपर की दो मंज़िलें होमस्टे के लिए रखी गईं। आज यह स्थान केवल ठहरने की सुविधा नहीं देता, बल्कि अपने भीतर एक परिवार की मेहनत, सौंदर्य-बोध और प्रकृति के प्रति प्रेम की कहानी भी समेटे हुए है।
हर कमरा, हर दीवार, हर खिड़की और हर बालकनी में एक व्यक्तिगत स्पर्श दिखाई देता था। वहाँ रखी किताबें और छोटी-छोटी वस्तुएँ घर के मालिक की रुचि और जीवन-दृष्टि का परिचय देती थीं।
इस होमस्टे की एक और खासियत है अतुल जी की ७० वर्षीय माता जी के हाथ का बना और आत्मीयता से परोसा गया लज़ीज़ खाना एवं डायनिंग टेबल पर रखे स्थानीय फलों से बने ६ प्रकार की चटनियाँ और ६ प्रकार के अचार।
अतुल मेहता ने हमें सेब की खेती की बारीकियों से भी परिचित कराया। सेब के पेड़ों में फूल आने का समय, उस दौरान आवश्यक सावधानियाँ, पराग कण का महत्व, बर्फबारी की मात्रा और मौसम का प्रभाव—इन सबके बारे में उनसे बातचीत करना अपने आप में एक सीखने वाला अनुभव था।
पहाड़ों पर फैले सेब के बागों को देखकर एक प्रश्न बार-बार मन में उठ रहा था—इन पेड़ों के ऊपर मच्छरदानी जैसी सफेद जालियाँ क्यों लगी हैं? उन्होंने बताया कि ये जालियाँ फसल को प्रतिकूल मौसम और अन्य प्राकृतिक प्रभावों से बचाने के लिए उपयोग की जाती हैं।
उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ कि एक सेब को पेड़ से हमारी मेज तक पहुँचने में प्रकृति, मौसम और किसान की कितनी मेहनत शामिल होती है।
सेब के बागों के बीच बिताए यादगार पल
जीवन में पहली बार पहाड़ों में, सेब के पेड़ों के बीच, इतने शांत और प्राकृतिक वातावरण में समय बिताने का अवसर मिला था।
खिड़की से बाहर देखो तो एक ओर सेबों से लदे पेड़। दूसरी ओर बादलों से खेलती पहाड़ियाँ। दूर नीचे बहती सतलुज नदी। आसपास खिले रंग-बिरंगे फूल और हवा में घुली ठंडक।
इन सबके बीच बैठकर ऐसा लगता था कि समय थोड़ा धीमा हो गया है।
शहरों में हम अक्सर शांति की तलाश करते हैं, लेकिन वहाँ जाकर महसूस हुआ कि शांति शायद कोई वस्तु नहीं है जिसे खोजा जाए। वह प्रकृति के साथ कुछ समय बिना जल्दबाजी के बिताने से स्वयं हमारे भीतर उतर आती है।
उस अनुभव को शब्दों में पूरी तरह बाँधना आसान नहीं है। वह एक ऐसा रूहानी अनुभव था जिसे केवल महसूस किया जा सकता है।
मॉल रोड की बारिश में सैर
कोटगढ़ से लौटने के बाद अगले दिन की शाम हमने शिमला की प्रसिद्ध मॉल रोड पर बितायी। आमतौर पर मॉल रोड का नाम आते ही खरीदारी, पर्यटकों की भीड़ और दूर दिखाई देती बर्फ से ढकी पहाड़ियों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन बारिश के मौसम में मॉल रोड का रूप बिल्कुल अलग था।
बादलों की एक हल्की परत पूरे वातावरण को अपने भीतर समेटे हुए थी। उन बादलों के बीच पैदल चलना, हवा में घुली नमी को महसूस करना और ठंडक के साथ शिमला की गलियों में घूमना एक अनूठा अनुभव था।
उस अनुभव में मुझे एक अजीब-सी सुरक्षा और सादगी महसूस हुई—जैसे दादी माँ की मुलायम सूती साड़ी की गोद में कोई बच्चा अपने आपको सुरक्षित महसूस करता है।
आस्था के पड़ाव
अगले दिन सुबह हमने शिमला के प्रसिद्ध जाखू क्षेत्र में स्थित बजरंगबली की विशाल प्रतिमा के दर्शन किए। पहाड़ की ऊँचाइयों पर स्थापित वह विशाल प्रतिमा अपने आप में अत्यंत प्रभावशाली है। मान्यता है कि संजीवनी बूटी की खोज में जाते समय हनुमान जी ने यहाँ विश्राम किया था। इस मान्यता की ऐतिहासिकता पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन उस स्थान पर पहुँचकर जो आध्यात्मिक अनुभव हुआ, वह निस्संदेह विशेष था।
वहाँ से लौटने का मन सहज ही नहीं हो रहा था।
इसके बाद हमने तारा देवी मंदिर के दर्शन किए। पहाड़ी पर स्थित मंदिर, वहाँ की स्वच्छता, वातावरण की शांति और पुजारी की सादगी मन को गहराई तक छू गई।
कभी-कभी किसी स्थान की सुंदरता उसके स्थापत्य या भौगोलिक स्थान से अधिक उसके वातावरण में होती है। तारा देवी मंदिर में वही अनुभव हुआ।
ऐसा ही एक शांत अनुभव नीम करोली बाबा की प्रेरणा से बने संकटमोचन मंदिर में भी मिला।
पहाड़ों की ऊँचाई और मन की शांति
यात्रा केवल देखने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए भी होती है।
अक्सर हम किसी पर्यटन स्थल पर जाते हैं, कुछ प्रसिद्ध स्थान देखते हैं, तस्वीरें खींचते हैं और वापस लौट आते हैं। लेकिन इस यात्रा ने मुझे एक अलग बात सिखाई।
यदि वास्तव में पहाड़ों को समझना है तो केवल पहाड़ों को देखना पर्याप्त नहीं है। वहाँ के लोगों को समझना होगा। उनकी सादगी को महसूस करना होगा। उनके जीवन की कठिनाइयों और उन कठिनाइयों का सहजता से सामना करने की उनकी क्षमता को देखना होगा।
यात्रा के दौरान मेरी आँखें लगातार बादलों और पहाड़ों की उस आँख-मिचौली को देखती रहीं। हर क्षण बदलते दृश्य इतने आकर्षक थे कि कैमरे की ओर ध्यान तभी जाता था, जब लगता कि यह दृश्य आँखों में पूरी तरह उतर चुका है।
बारिश के मौसम में की गई यह शिमला और कोटगढ़ की यात्रा मेरे लिए केवल एक पर्यटन अनुभव नहीं थी। यह प्रकृति की सुंदरता, मन की संवेदनाओं, हिमाचल की संस्कृति, सेब की खेती की कहानी, आध्यात्मिक शांति और मानवीय सरलता का एक अद्भुत संगम थी।
वर्षों पुरानी मेरी एक इच्छा पूरी हुई—सेब के बाग में कुछ दिन बिताने की इच्छा। लेकिन यात्रा ने मुझे उससे कहीं अधिक दिया। उसने सिखाया कि पहाड़ केवल ऊँचाइयाँ नहीं होते। वे धैर्य सिखाते हैं। बादल केवल आकाश में तैरते हुए जलकण नहीं होते। वे हमें परिवर्तन की सुंदरता दिखाते हैं। और यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना नहीं होती। कभी-कभी यात्रा हमें वापस अपने भीतर ले जाती है। शायद यही इस यात्रा की सबसे सुंदर स्मृति है—बादलों की आँख-मिचौली, सेबों की खुशबू और पहाड़ों की वह सहजता, जो लौट आने के बाद भी मन के किसी शांत कोने में बनी रहती है।
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